Thursday, January 2, 2014

रेशम के रास्ते पर


 
दिसंबर के दूसरे हप्ते में दिल्ली में भारतीय विद्या भवन ने एक अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। विषय था – रेशम के रास्ते पर संस्कृत। भवन को निदेशक प्रधान जी  के आग्रह के कारण संगोष्ठी में जाना हुआ और समापन सत्र में कुछ बोलना भी पड़ा। समापनसत्र की अध्यक्ष डा. लोकेशचंद्र कर रहे थे। उन्होंने मुझसे संस्कृत में बोलने का आग्रह किया –यह कहते हुए कि  संगोष्ठी में चीन, जर्मनी और दूसरे देशों से जो विद्वान् आये हैं, वे सुनना चाहते हैं कि भारत में संस्कृत कैसे बोली जाती है।  संस्कृत में बोलने से मैं अपनी बात उन पारंपरिक पंडितों तक भी पहुँचा सकता था, जो इस संगोष्ठी में मौजूद थे, और अंग्रेजी की अपेक्षा संस्कृत ज्यादा समझ सकते थे। पर मैंने जो कहा, वह इन्हीं पंडितों को बहुत प्रीतिकर न लगा होगा।

हम भारत की देन पर गौरव के साथ बात करते हैं, भारत को एशिया के अन्य कुछ देशों ने बहुत कुछ दिया भी है – यह भूल जाते हैं। एशियाई संस्कृति के बृहत्तर परिप्रेक्ष्य में विचारों और विद्याओं तथा साहित्य के क्षेत्र में भारत और अन्य एशियाई देशों के बीच पिछले तीन हजार सालों में होने वाले आदान प्रदान पर बातचीत होनी चाहिये। दाराशिकोह ने एशिया की इसी बड़ी संस्कृति का सपना देखा था। उन्होंने सिर्र-ए-अकबर में 52 उपनिषदों के फारसी में अनुवाद किये। ये ही अनुवाद रेशम के रास्ते से होते हुए खाडी के देशों में पहुँचे, इन्हीं अनुवादों के अनुवाद से फ्रेंच, जर्मन और लैटिन भाषाओं में हुए। ओपनिखत नाम के दाराशिकोह के अनुवाद के लैटिन अनुवाद से ही शापनहार जैसे दार्शनिक इस तरह अभिभूत हुए कि वे उसकी किताब सिरहाने रख कर सोते थे।

संगोष्ठी में यह बात उभर कर आई कि जिसे रेशम का रास्ता कहा जा रहा है, उस पर रेशम का आयात-निर्यात कम और घोड़ों की आवाजाही ज्यादा हुई है। पर उस रास्ते से चीन और दक्षिणपूर्व एशिया तथा पश्चिम एशिया के देशों का संबंध भारत के साथ हजारों साल बना रहा। इसी रास्ते से पाँचवीं छठी शताब्दियों में पंचतंत्र की पोथियाँ ईरान पहुँची और उनका प्राचीन फारसी या पहलवी भाषा में अनुवाद हुआ। इसी पहलवी अनुवाद से पुनः अनुवाद सीरियाई और अरबी भाषाओं मे हुए और उन अनुवादों के जरिये पंचचंत्र का प्रसार सारी दुनिया में हुआ। पर फारस के बादशाह अनुशीर्वान ने जो पंचतंत्र का अनुवाद कराया, उसमें उन्होने संजीवक बैल की हत्या की साजिश करने वाले मंत्री सियार को राजा से सजा दिलवा दी। यह प्रसंग पंचतंत्र के किसी भी भारतीय संस्करण में नहीं है। ईरान के बादशाह अपने देश की रीति और नीति के अनुसार पंचतंत्र का अनुकूलन करना चाहते थे।  

कालिदास ने अपने नाटक में नायक दुष्यंत के मुँह से कहलवाया है – शरीर आगे सरक रहा है, मन पीछे भाग रहा है, जैसे बाँस के झंडे पर चीनी रेशम के कपड़े की पताका बाँध कर कोई हवा के खिलाफ चले, तो पताका पीछे फरफराती है। कालिदास ग्रीस से आई यवनियों को राजा दुष्यंत की सेवा में लगवाते हैं और चीनांशुक की  कोमलता पर रीझते हैं। वे अपने नायक रघु को दिग्विजय कराते हुए वंक्षु या आक्सस नदी के किनारे तक पहुँचा देते हैं। एशिया की बड़ी संस्कृति का सपना उनके मन में भी कहीं था।